• नई राजनीति की जरूरत, पुराने चेहरों का बोझ

    आखिरकार निशांत कुमार का बयान भी आ गया कि एनडीए को चाहिए कि नीतीश को कुमार को ही मुख्यमंत्री बनाए रखने की घोषणा कर दे

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    - अरविन्द मोहन

    इस बार यह शोर पहले से मच रहा है। दूसरी ओर भाजपा सरकार ने लालू जी और उनके परिवार पर कानूनी शिकंजा कसना शुरू कर दिया है जो चुनाव पास आने तक नाटकीय रूप ले लेगा। लालू जी इससे निजी रूप से कमजोर पड़ें न पड़ें, राजनैतिक रूप से कमजोर होंगे। उधर राजद का मतलब अहीर और मुसलमान गठजोड़ से आगे बढ़ ही नहीं रहा है और ऐसा गठजोड़ जैसे ही ताकतवर दिखता है।

    आखिरकार निशांत कुमार का बयान भी आ गया कि एनडीए को चाहिए कि नीतीश को कुमार को ही मुख्यमंत्री बनाए रखने की घोषणा कर दे। निशांत माने नीतीश कुमार के पुत्र। पहली बार सार्वजनिक रूप से ऐसा बयान देकर उन्होंने कई तरह के संकेत दिए। निश्चित रूप से पहला संकेत तो राजनीति में आने का है। बीते बीस साल से मुख्यमंत्री के संग रहने और अकेली संतान होने के चलते सारा लाड़-प्यार पाने के बावजूद अभी तक उनके किसी आचरण को लेकर किसी तरह की चर्चा नहीं थी। बल्कि वे इतने शांत और सावधान तरीके से रहते थे कि काफी सारे राजनैतिक पंडित उनके सामान्य होने पर ही शक करते थे। अब अगर वे बीआईटी मेसरा से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद और पचास साल की उम्र में और पार्टी तथा समाज के अनेक पक्षों से बार-बार की जा रही मांग के बाद सक्रिय होने का फैसला करते हैं तो उन्हें शुभकामना दी जा सकती है। अपनी स्वर्गवासी मां के जन्मदिन पर आयोजित किसी कार्यक्रम में उन्होंने यह बात कही और जदयू का प्रदर्शन पहले से बेहतर होने की बात भी कही।

    यह संयोग है कि उनका कहना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अपने बिहार दौरे में नीतीश जी को 'लाड़ला मुख्यमंत्री' बताने के दो दिन बाद ही हुआ। प्रधानमंत्री ने इस दौरे के साथ ही भाजपा और एनडीए के चुनाव अभियान का शंखनाद भी कर दिया। इसमें की लोगों को पांच साल पहले बीच कोरोना में हजारों रंगीन टीवी सेट के माध्यम से बिहार में आनलाइन शंखनाद करने वाला प्रसंग भी याद आया क्योंकि प्रधानमंत्री ने एक साथ बिहार के सारे कोनों को छू लिया था। उन्होंने नीतीश जी को आगे रखकर चुनाव लड़ने की घोषणा नहीं की। शायद उनके पास ऐसा कोई और नाम है भी नहीं। लेकिन बीते साल भर में एनडीए और भाजपा की तरफ से यह कहा जाता रहा है। कमाल यह है कि इसके बावजूद निशांत कुमार को यह बात दोहराने की जरूरत हुई। बीते दो-तीन महीनों में विपक्षी राजद की तरफ से नीतीश कुमार के एक बार फिर से पाला बदलने की बात उछाली जा रही है और लालू प्रसाद यादव ने अब भी नीतीश का स्वागत करने की बात भी चला दी है।

    खुद नीतीश कुमार भी इस सवाल पर अपने ही आचरणों से संदेह गहरा रहे हैं। दिल्ली के अपने दो दौरों में उन्होंने भाजपा के किसी नेता से भेंट नहीं की या भाजपा के शीर्ष नेताओं ने उन्हें समय न दिया। वे दिल्ली में भाजपा सरकार के शपथ ग्रहण में भी नहीं ये जबकि एनडीए के बाकी सभी मुख्यमंत्री ये। उससे भी ज्यादा चर्चा उनकी पार्टी के दो बड़े नेताओं का दिल्ली आकर पूरी तरह भाजपा के रंग में रंगना है और इसे ही राजनैतिक पंडित नीतीश कुमार की घेराबंदी बताते हैं। नीतीश बिहार में भी भाजपा के एक गुट के व्यवहार को लेकर बहुत प्रसन्न नहीं रहते। यह समूह भाजपा के अकेले चुनाव लड़ने की वकालत भी करता है। यह अटकल भी लगती है कि चुनाव तक भाजपा उनको आगे रखकर बाद में कोई और पद या जिम्मा दे देगी। नीतीश और उनके समर्थक यह नहीं चाहते। अब जाने अनजाने भाजपा का समर्थन आधार बढ़ता गया है लेकिन अगड़ों को छोड़कर कोई और सामाजिक समूह पक्काा समर्थक नहीं है-बीच के प्रयास नीतीश मामले में हां-ना के चक्कर में खिसक गया है।

    इसलिए निशांत के बयान का एक तीसरा मतलब भाजपा के संग अपनी पार्टी के अगड़े नेताओं के लिए भी है जिनकी भाजपा से नजदीकी जगजाहिर है। यही लोग नीतीश कुमार के पाला बदलकर भाजपा के संग आने का माध्यम भी बने थे और अभी दिल्ली में जमे हैं। भाजपा को भी इस बयान का मतलब यह निकालना चाहिए कि नीतीश कुमार ललन सिंह, विजय चौधरी और संजय झा जैसों के समांतर किसी अपने और ज्यादा भरोसेमंद को खड़ा करना चाहते हैं। निशांत पिता की इच्छा देखकर ही पंख फैलाना शुरू कर रहे हैं। इस क्रम में आईएएस रामचन्द्र प्रसाद सिंह का प्रसंग याद करना चाहिए जो ज्यादा पंख फैलाकर झुलस चुके हैं। जब वे नीतीश जी के साथ थे तो बिना राजनैतिक पृष्ठभूमि के भी सबसे भरोसेमंद थे।

    दूसरी ओर, कांग्रेस और राजद के रिश्ते एनडीए के घटकों से भी ज्यादा खराब हैं। हरियाणा का चुनाव हारने के बाद तो अखिलेश और तेजस्वी का रुख भी बदला। दिल्ली चुनाव ने दूरी और बढ़ाई और अब तो एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी भी शुरू हों गई है। भाजपा की तरह कांग्रेस में भी कुछ लोग अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने की वकालत कर रहे हैं। कांग्रेस का भी आधार या स्वीकृति बढ़ी है लेकिन कोई एक या दो ठोस सामाजिक आधार नहीं है। मुसलमान समर्थक हैं लेकिन राजद साथ न हो तो उनका वोट मिलने का भरोसा नहीं है। संगठन कमजोर है और अगर कन्हैया कुमार और पप्पू यादव जैसे उत्साही उसके पास हैं तो लालू-तेजस्वी उनको जमीन देने को तैयार नहीं हैं। लालू जी ने पिछले लोकसभा चुनाव में अहीरों को काम टिकट, कोइरी समाज को ज्यादा टिकट और वाम दलों समेत सारे विरोधियों को साथ लेकर अच्छी टक्कर दी लेकिन पहले दो राउंड के बाद भाजपा फिर से जंगल राज का शोर मचाकर बाजी पलट दी।

    इस बार यह शोर पहले से मच रहा है। दूसरी ओर भाजपा सरकार ने लालू जी और उनके परिवार पर कानूनी शिकंजा कसना शुरू कर दिया है जो चुनाव पास आने तक नाटकीय रूप ले लेगा। लालू जी इससे निजी रूप से कमजोर पड़ें न पड़ें, राजनैतिक रूप से कमजोर होंगे। उधर राजद का मतलब अहीर और मुसलमान गठजोड़ से आगे बढ़ ही नहीं रहा है और ऐसा गठजोड़ जैसे ही ताकतवर दिखता है भाजपा को सुविधा हो जाती है और गैर यादव पिछड़ों का वोट बढ़ जाता है तथा अगड़ों का वोट ज्यादा गोलबंद होकर मिलता है। जब तक नेतृत्व में हिस्सेदारी और लोकतान्त्रिक व्यवहार की उम्मीद न हों दूसरे पास आते नहीं और लालू जी से परिवार से अलग नेता और लोकतान्त्रिक आचरण की उम्मीद करना कुछ ज्यादा ही मुश्किल लक्ष्य है। दुर्भाग्य यह है कि जिस बिहार को अब नई राजनीति की जरूरत है वहां सब कुछ दो थके पुराने चेहरों के इर्द-गिर्द चलता दिखता है।

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